Dhan singh,Trivendra, महेंद्र भट्ट और पुष्कर सिंह पर चुनाव के साल में सवाल?
विशेष जांच रिपोर्ट-
Subharti–GBCM प्रकरण: तीन मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में जारी फैसलों पर गंभीर सवाल
उत्तराखंड में पहली बार किसी acting cm पर हुई थी court के आदेश से FIR
“पहले खंडूरी, रमेश पोखरियाल निशंक सहित हरीश रावत, गोबिन्द सिंह कुंजवाल, हरक सिंह रावत पर भी उठे सवाल और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एडमिशन हुए थे निरस्त। तो क्या नेता सिर्फ अपना फायदा देखते है? आम जनमानस का कुछ नहीं? पर अब सीबीआई की एंट्री सबका निचोड़ निकाल ही देगी।”
देहरादून। Subharti–GBCM से जुड़े भूमि, नर्सिंग प्रवेश और वित्तीय दायित्वों के मामले ने अब केवल संस्थानों तक सीमित न रहकर राजनीतिक जवाबदेही का रूप ले लिया है।
सरकारी रिकॉर्ड, समिति रिपोर्टों और प्रशासनिक कार्रवाइयों से यह स्पष्ट होता है कि यह मामला तीन अलग–अलग मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में लिए गए निर्णयों और चूक से जुड़ा है।
त्रिवेंद्र सिंह रावत: Essentiality Certificate किस आधार पर?
सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार:
- त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल में
- Essentiality Certificate (EC) जारी किया गया,
- जबकि बाद की जांचों में:
- भूमि स्वामित्व ट्रस्ट के नाम दर्ज न होना,
- संस्थागत नाम परिवर्तन की अनियमितताएँ,
- और पूर्व न्यायिक/प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी
जैसे तथ्य सामने आए।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है:
क्या EC (essentiality certificate)जारी करते समय सभी तथ्य, भूमि रिकॉर्ड और पूर्व आदेशों का समुचित सत्यापन किया गया था?
यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता मानी जाएगी।
तीरथ सिंह रावत: बिना पुनः परीक्षण के निर्णय क्यों?
त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत के कार्यकाल में:
- Subharti–GBCM से जुड़े मामलों की
- न तो व्यापक समीक्षा की गई,
- न ही पूर्व में उठे सवालों पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण आया।

यदि सभी तथ्य सरकार को मालूम थे और ३०० छात्रों का भविष्य ख़राब किया था और 97.50 करोड़ पेनल्टी लगाई ही थी तो क्यों दुबारा नाम बदल कर NOC जारी की गई? या तत्कालीन मुख्यमन्त्री त्रिवेंद्र आँख मूँदे बैठे थे ? जबकि उनके ही कार्यकाल में ३०० छात्र राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में शिफ्ट किए गए और राज्य सरकार भी एक अरब रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ा।
आज जब:
- DME की समिति,
- कमिश्नर-स्तरीय SIT,
- और जिलाधिकारी द्वारा धारा 167 की कार्रवाई
यह दिखा रही है कि प्रारंभिक तथ्यों में गंभीर खामियाँ थीं,
तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है:
क्या मुख्यमंत्री कार्यालय ने फाइलों को पढ़े बिना ही प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखी?



पुष्कर सिंह धामी: कार्रवाई के बावजूद राजनीतिक संरक्षण क्यों?
वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में:
- ₹87.50 करोड़ की वसूली और कुर्की की कार्रवाई,
- भूमि का राज्य में निहितीकरण,
- CBI का औपचारिक प्रवेश,
- और SIT जांच—सब एक साथ चल रहे हैं।
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Screenshot 

Central govt letter 

Note sheet 
Note sheet इसके बावजूद:
- वही मंत्रीमंडलीय चेहरे,
- वही प्रशासनिक ढांचा,
- और कोई स्पष्ट राजनीतिक जवाबदेही तय नहीं।
यह स्थिति यह सवाल पैदा करती है:





निदेशालय चिकित्सा शिक्षा की केंद्रीय विजिलेंस के निर्देश के आधार पर हाई लेवल जांच समिति में रास बिहारी बोस सुभारती यूनिवर्सिटी के नर्सिंग कॉलेज के 2020 से 2025 तक के एडमिशन अवैद्य घोषित किए। छात्रों एवं अभिभावकों ने धामी सरकार को कोसा। मचा हड़कंप
सरकार कार्रवाई तो कर रही है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने से बच रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब केंद्रीय एजेंसियाँ और राज्य प्रशासन एक साथ सक्रिय हों, तब कैबिनेट स्तर पर “सब ठीक है” का संदेश देना अविश्वसनीय हो जाता है।
‘संजोग’ या ‘सिस्टम फेल्योर’?
तीन अलग–अलग मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में:
- एक ही संस्थान को लाभ,
- एक जैसी फाइलों का आगे बढ़ना,
- और अब भारी वसूली व केंद्रीय जांच—
- और इतनी बड़ी रिकवरी होने के बाबजूद पिछली रिकवरी ना कर PG की सीट हेतु एसेंशियालिटी सर्टिफिकेट जारी करना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है जबकि निरीक्षण समिति ने लिखा की डमी टीचर दिखाए गए है और मानक पूर्ण नहीं है और इसी कारण से सही रिपोर्टाइडिन वाले इन प्रोफेसर का स्थानांतरण हल्द्वानी कर दिया गया ।
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फर्जी टीचर और कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं रिपोर्ट २०२५ 
Dummy faculty and no infrastructure
इसे केवल संयोग मानना कठिन है।
यह प्रकरण अब व्यक्तियों से अधिक, सिस्टम की असफलता की कहानी बन चुका है।
जनता के 5 सीधे सवाल
- Essentiality Certificate जारी करते समय पूरी जांच क्यों नहीं हुई?
- बाद के कार्यकाल में पूर्व निर्णयों की समीक्षा क्यों नहीं की गई?
- जब भूमि ट्रस्ट के नाम दर्ज नहीं थी, तो संचालन कैसे चलता रहा?
- कार्रवाई होने के बावजूद राजनीतिक जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
- क्या सरकार पूरी फाइल जनता के सामने रखने को तैयार है?
- पहले ३०० एमबीबीएस के छात्रों से घोखा हुआ और अब नर्सिग के ३०० छात्रों से धोखा हुआ तो क्या सरकार आंखें मूँद कर बैठी थी? या मिठाई खा कर बैठे थे ?
निष्कर्ष
Subharti–GBCM प्रकरण अब केवल प्रशासनिक नहीं रहा।
यह नीतिगत निर्णयों, मुख्यमंत्री कार्यालयों की भूमिका, और कैबिनेट जवाबदेही का विषय बन चुका है।
CBI के प्रवेश के बाद यह स्पष्ट है कि अब यह मामला दबाया नहीं जा सकता।
या तो सरकार पूरी सच्चाई सार्वजनिक करेगी,
या फिर इतिहास इसे राजनीतिक चुप्पी की एक और मिसाल के रूप में दर्ज करेगा।
यह मात्र एक सार्वजनिक रिपोर्ट पर आधारित एक तथ्य रिपोर्ट है यदि सीबीआई जाँच बैठा दी जाये तो वॉयस ऑफ़ नेशन चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में 1000 crore का घोटाला सार्वजनिक करने के तब्यों को प्रकट करने का दावा मय सबूत करने का दावा करता है । बैठा दीजिए सी बी आई जांच ।
अब चुनाव का साल है और मात्र 9 महीने (2027) (आचार संहिता आदि छुट्टियों को जोड़कर ) बचे है मोदी जी के पास और बीजेपी के पास बचे है बुझे हुए कारतूस जैसे त्रिवेंद्र सिंह तीरथ सिंह,धन सिंह,रितु खंडूरी जैसे विवादित नेता, तो देखना यह होगा की कौन सा साफ़ और स्वस्थ छवि का कुमाऊनी नेता भाजपा चुनावी वर्ष में आगे लाएगी जिसकी समाजिक छवि भाजपा को आगे ले जाए और जो निर्वादित और पार्टी का अनुभवी हो ।
हाई लेवल कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार नर्सिंग कोर्स को 2011 में बंद कर दिया गया तो २०२० से आज तक के छात्रो से धोखा हुआ तो आज तक धन सिंह रावत,त्रिवेंद्र सिंह रावत ,तीरथ सिंह रावत,महेंद्र भट्ट और पुष्कर सिंह धामो द्वारा FIR क्यों नहीं दर्ज की गई? क्या वहाँ जाते समय पता नहीं था कि किस दुराचारी के यहाँ जा रहे है ? या सिर्फ़ इंटरनल सेटिंग का मामला था ?
कानूनी नोट
यह रिपोर्ट आधिकारिक दस्तावेज़ों, प्रशासनिक आदेशों और जांचों पर आधारित है।
निर्णय सक्षम प्राधिकरण/न्यायालय का विषय है।


हालाँकि कुछ ईमानदार अधिकारी भी प्रदेश में मौजूद है तो क्या इन सब तथ्यों के आधार पर नए चिकित्सा शिक्षा सचिव और सरकार इन दोषियों पर FIR दर्ज करेंगे और इतना भ्रष्टाचार फैलाने के बाद धन सिंह रावत मुख्यमन्त्री बनने का सपना संजो रहे है?


इस प्रकार लगता है की धन सिंह को मुख्यमंत्री बनाकर बिल्ले को दूध की रखवाली करने का काम दिया जा रहा हैं जबकि मात्र 537 वोटो से जीते व्यक्ति को उत्तराखंड का cm बना दिया जाये तो इसका मतलब क्या होगा ?

छात्रों सहित अभिभावक और आम जनता नव नियुक्त निदेशक चिकित्सा शिक्षा और उनकी टीम से अपेक्षा करती है की जिस प्रकार उन्होंने अपनी दबंग कार्यशैली के चलते उक्त संस्था की 87.50 करोड़ की वर्षों से रुकी हुई रिकवरी वारंट जिलाधिकारी देहरादून सविन बंसल के माध्यम से भेजे उसी प्रकार उक्त संस्था के ख़िलाफ़ मुक़दमा भी दर्ज करवायेंगे ।

The honest officer, who initiated recovery of 87.50 crores of state govt against subharti institutions.
सूत्रो के अनुसार सीबीआई ने सभी के रिकॉर्ड पर गोपनीय तरीके से जांच बैठा दी है और सभी अधिकारी सीबीआई के राडार पर है और शीघ्र ही बड़ी कार्यवाही और खुलासे सामने आ सकते है।