कल मनाया जाएगा मकर संक्रांति पर्व, 15 जनवरी को भी होगा पुण्य स्नान

हरिद्वार। छह महीने लंबी दक्षिणायन यात्रा समाप्त कर सूर्यदेव अब 14 जनवरी से उत्तर दिशा की यात्रा प्रारंभ करेंगे। इसी के साथ उत्तरायणी पर्वों का आगाज हो जाएगा। माघ मास लगते ही विवाह आदि मांगलिक कार्यों पर लगा विराम समाप्त हो जाएगा। 14 जनवरी को सूर्योदय काल से सूर्यास्त तक मकर संक्रांति का पर्वकाल बना रहेगा। इसके साथ ही गुड़ तिल के पर्व प्रारंभ हो जाएंगे। ऋतु परिवर्तन के इस पर्व पर हेमंत ऋतु विदा लेगी और शिशिर ऋतु का आगमन हो जाएगा।

बुधवार माघ कृष्ण एकादशी के दिन सूर्यनारायण अनुराधा नक्षत्र में धनु राशि त्यागकर मकर राशि में प्रविष्ट होंगे। मान्यता है कि सूर्य के मकरस्थ होते ही तिल फटकने लगते हैं, गुड़ तिल के पर्व प्रारंभ हो जाते हैं। इनमें लोहड़ी, सकट, षट्तिला एकादशी, वसंत पंचमी, मौनी अमावस आदि प्रमुख पर्व शामिल हैं। उत्तरायण होने पर सूर्य दक्षिण पूर्व दिशा से उत्तर दिशा की ओर बढ़ना प्रारंभ करते हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि मकर संक्रांति से जाड़ा तिल-तिल घटने लगता है। यद्यपि 31 दिसंबर से लगा हुआ कड़ाके की ठंड का 40 दिनों का चिल्ला 8 फरवरी तक चलता रहेगा।

मकर संक्रांति का हर राज्य में अलग-अलग नाम

मकर संक्रांति का हर राज्य में अलग-अलग नाम हैं। जैसे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, असम में बिहू और दक्षिण भारत में ओणम आदि। उत्तर भारत के गांगेय प्रदेशों में स्नान पर्व प्रारंभ होते हैं। पर्वतीय राज्यों में उत्तरायणी शुरू हो जाती है। पंजाब का पर्व लोहड़ी भी गुड़ तिल मूंगफली और अग्नि पूजा से जुड़ा है। गुरुकुलों में इसी दिन विद्यासत्र प्रारंभ होते थे। संक्रांति के अवसर पर उड़द की दाल और चावल वाली खिचड़ी घरों में खाई जाती है और दान की जाती है।

देवताओं का प्रभात काल है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति वस्तुतः देवताओं का प्रभात काल है। यह प्रभात काल लगभग मध्य जुलाई तक चलता है। तभी से छह महीने के लिए दक्षिणायन शुरू हो जाता है। उत्तरायणी की प्रतीक्षा शरशैय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने अपने महाप्रयाण के लिए की थी।

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